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ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम:

हमारे बारे में

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भक्तवत्सल भगवान श्री राधामाधव की प्रेरित प्रेरणा से सन् 2015 में ‘वसुधा फाउन्डेशन ट्रस्ट’ द्वारा गोमतीनगर माधव ग्रीन्स सोसाइटी में लौलाई ग्राम स्थित मंदिर भूमि का चयन किया गया। वसुप्रधा फाउन्डेशन ट्रस्ट द्वारा समय-समय पर जनकल्याण हेतु सेवा प्रदान की जाती है। उसी क्रम में भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से श्री राधामाधव के तीर्थस्वरूप दिव्य मंदिर निर्माण के संकल्प का बीजारोपण हुआ। मंदिर निर्माण हेतु चयनित भूमि में एक पुरातन विशालकाय दिव्य पीपल वृक्ष प्रतिष्ठित है जो ग्राम निवासियों द्वारा पूजित होता रहा है। इसी देववृक्ष की प्रतिष्ठा से देवभूमि या ब्रह्मभूमि का लक्षण प्रतीत हुआ जो मंदिर के प्रतिष्ठा हेतु सर्वथा उपयुक्त बना। वसुप्रथा फाउन्डेशन ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी द्वारा सन् 2015 में भगवान की कृपाप्रसाद के रूप में मंदिर निर्माण हेतु सर्वप्रथम भूमिपूजन एवं वास्तुपुरुष पीठ का विधि-विधान से पूजन कर प्रतिष्ठा की गई। शनैः शनैः मंदिर का निर्माण प्रारम्भ हुआ तथा श्री राधामाधव की कृपा से सन् 2019 तक मंदिर निर्माण पूर्ण हुआ था।

सेवा

नित्य सेवा

नित्य सेवा

विशेष सेवा

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उत्सव

उत्सव

गौ सेवा

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वेद पुराणों के अनुसार:

गौएं विष्व की माता मानी गयी हैं। श्री ब्रह्माजी ने जब जगत सृष्टि की कामना की थी, तब उन्होंने समस्त प्राणियों की जीवनवृत्ति के लिए पहले-पहल गौओं की सृष्टि की थी। गौमाता मातृशक्ति की साक्षात प्रतिमा है। भगवान वेदव्यास के अनुसार गायों से सात्विक वातावरण निर्माण होता है। गायें अत्यंत पवित्र है, इसलिए जहां रहती हैं वहां कोई भी दूषित तत्व नहीं रहता। गौएं स्वर्ग जाने की सीढ़ी हैं। गौएं सब तरह से कल्याणमयी हैं। देवता तथा मनुष्य सबको भोजन देने वाली भी गौएं ही है। गौओं में सभी देवताओं और तीथों का निवास है तथा वे भगवान की सर्वाधिक प्रिय हैं। गौओं की प्रसन्नता से सभी देवता, ऋषि, भगवान की प्रसन्नता होती है।

ब्रह्माण्ड पुराण में वर्णित गोसावित्री स्त्रोत के अनुसार:

गौ के सींगों के अग्रभाग में साक्षात जनार्दन विष्णुस्वरूप भगवान वेदव्यास रमण करते हैं। उसके सींगों की जड़ में देवी पार्वती और सींगों के मध्य भाग में भगवान सदाषिव विराजमान रहते . . . . . .

दान की गयी राशि आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80 G (2) (a) (iv) के अंतर्गत आयकर छूट के लिए मान्य दान की गयी राशि आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80 G (2) (a) (iv) के अंतर्गत आयकर छूट के लिए मान्य

दान की गयी राशि आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80 G (2) (a) (iv) के अंतर्गत आयकर छूट के लिए मान्य

गुरु जी के मुख से

श्री राधा माधव देवस्थानम लखनऊ का एक ऐसा मंदिर है जहाँ पर भगवन श्री कृष्ण राधा जी के साथ मानो साक्षात् विराजमान है जिनके दर्शन मात्र से भक्तों के दुःख दर्द दूर हो जाते है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है मंदिर आये वाले श्रद्धालुओं का ऐसा मानना है कि भगवान श्री राधामाधव उनके सारे बिगड़े काम संवार देते है मंदिर का वातावरण इतना सुहावना होता है कि मंदिर आने वाले श्रद्धालु भगवान की भक्ति में रम जाते है | भगवान राधामाधव का इस देवस्थाम का निर्माण वास्तुशास्त्र के सभी के अनुरूप किया गया है इस देवस्थानम में भगवान श्री कृष्ण के साथ साथ भगवान शंकर , माता दुर्गा , देवों में सर्प्रथम पुज्य्नीय देव श्री गणेश, बजरंग बलि, शनि देव, गरुण देव  और अन्य देवता साक्षात मूर्तिरूप में विराजमन है | भगवान राधामाधव के द्वार उनके भक्तों के लिए हमेशा खुले रहते है आशा है श्री राधामाधव देवस्थानम के दर्शन मात्र से आपका मंगल होगा और आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी

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विविध वस्तुओं का दान

दान देना हर किसी को नहीं आता | कोई भाग्यवाला होता है जो दान देना जानता है। दान देते समय बहुत सावधान होना चाहिए । पुराणों, उपनिषदों में समझाया गया है, कि, जब मन में दान देने की कामना हो, तो यह सोचना चाहिए कि मेरा पुण्य जागा है। अतएव अपनी सामर्थ्य के अनुसार ‘दान’ अवश्य करना चाहिए। सतयुग में तपस्या को ही सबसे बड़ा धर्म माना गया है, त्रेता में ज्ञान ही उत्तम बताया गया है। द्वापर युग में यज्ञ व कलियुग में एकमात्र ‘दान’ ही श्रेष्ठ कहा गया. . . . . . .. . 

भगवदगीता

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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
अर्थात् -: जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है इसलिए जो अटल है अपरिहार्य है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा॥
अर्थात् -: जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है। वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है।
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