गुरूजी – मार्गशीर्ष

Guru Ji- Margshirsh

मार्गशीर्ष पूर्णिमा दृ श्री दत्तात्रेय जयंती भगवान दत्तात्रेय श्री योगीयों में श्रेष्ठ महायोगीश्वर हैं तथा पुराणानुसार भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनका अवतरण परम पुण्य मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा तिथि को प्रदोष काल में हुआ था। अतः इस दिन गुरु दत्तात्रेय जी का महोत्सव दत्त जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। पुराणानुसार एक बार महर्षि अत्रि ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें कहा कि मैंने अपने आप को पुत्र रूप में तुम्हें दे दिया, ऐसा वरदान दिया। भगवान विष्णु ही महर्षि अत्रि के पुत्र रूप में अवतरित हुए और दत्त कहलाए। अत्रि पुत्र होने से ‘आत्रेय’ कहलाते हैं। दत्त और आत्रेय शब्द के संयोग से इनका ‘दत्तात्रेय’ नाम जगत प्रसिद्ध हो गया। इनकी माता का नाम अनसूया है, जो सतिशिरोमणि हैं तथा उनका पतिव्रत्य संसार में प्रसिद्ध है। पुराणानुसार एक बार ब्रह्मा, विष्णु, महेश भगवान से देवी अनसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा की लीला रची तथा देवी अनसूया के पतिव्रत धर्म की निष्ठा से प्रसन्न हो तीनों देव ने देवी अनुसूया से वरदान मांगने को कहा, तो देवी बोलीं-आप तीनों देव मुझे पुत्र रूप में प्राप्त हों। ’तथास्तु’- कहकर तीनों देव अपने -अपने लोक को चले गये । कालान्तर में ये ही तीनों देव अनुसूया के गर्भ से प्रकट हुए। ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा तथा विष्णु के अंश से दत्तात्रेय जी का जन्म हुआ। इस प्रकार महर्षि अत्रि तथा अनसूया के पुत्र रूप में श्री दत्तात्रेय जी भगवान विष्णु के ही अवतार हैं और इन्हीं के प्राकट्य की तिथि श्री दत्तात्रेय जयन्ती कहलाती है, जो परम पुण्य प्रदान करने वाली है। परम भक्त वत्सल भगवान दत्तात्रेय जी कृपा की मूर्ति कहे जाते हैं और भक्त के स्मरण करते ही उसके पास पहुंच जाते हैं। इस तिथि में मंदिरों में इनकी प्रतिमा का अभिषेक पूजन भोग इत्यादि से अर्चना की जाती है। भगवान दत्तात्रेय श्रीविद्या के परम आचार्य हैं। इनके पूजन अर्चन से परमपुण्य प्राप्त होता है तथा इनकी कृपा से भक्ति योग, ज्ञान योग, तंत्र सिद्धियां प्राप्त होती हैं। भक्त के स्मरण मात्र से अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। यही भगवान दत्तात्रय की विशेष महिमा है।

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