Gau Seva - गौ सेवा

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गौ महिमा

वेद पुराणों के अनुसार:

गौएं विष्व की माता मानी गयी हैं। श्री ब्रह्माजी ने जब जगत सृष्टि की कामना की थी, तब उन्होंने समस्त प्राणियों की जीवनवृत्ति के लिए पहले-पहल गौओं की सृष्टि की थी। गौमाता मातृशक्ति की साक्षात प्रतिमा है। भगवान वेदव्यास के अनुसार गायों से सात्विक वातावरण निर्माण होता है। गायें अत्यंत पवित्र है, इसलिए जहां रहती हैं वहां कोई भी दूषित तत्व नहीं रहता। गौएं स्वर्ग जाने की सीढ़ी हैं। गौएं सब तरह से कल्याणमयी हैं। देवता तथा मनुष्य सबको भोजन देने वाली भी गौएं ही है। गौओं में सभी देवताओं और तीथों का निवास है तथा वे भगवान की सर्वाधिक प्रिय हैं। गौओं की प्रसन्नता से सभी देवता, ऋषि, भगवान की प्रसन्नता होती है।

ब्रह्माण्ड पुराण में वर्णित गोसावित्री स्त्रोत के अनुसार:

गौ के सींगों के अग्रभाग में साक्षात जनार्दन विष्णुस्वरूप भगवान वेदव्यास रमण करते हैं। उसके सींगों की जड़ में देवी पार्वती और सींगों के मध्य भाग में भगवान सदाषिव विराजमान रहते हैं। उसके मस्तक में ब्रह्मा, कंधे में बृहस्पति, ललाट में वृषभारूढ़ भगवान शंकर, कानों में अश्विनी कुमार, जीभ में देवी सरस्वती तथा वक्षः स्थल एवं पिंडलियों में सारे देवता निवास करते हैं। उसके खुरों के मध्य भाग में गंधर्व, अग्रभाग में चंद्रमा एवं भगवान अनंत तथा पिछले भाग में मुख्य-मुख्य अप्सराओं का स्थान हैं। उसके पीछे के भाग (नितम्ब) में पितृगणों का तथा भृकुटिमूल में तीनों गुणों का निवास बताया गया है। उसके रोमकूपों में ऋषिगण तथा चमड़ी में प्रजापति निवास करते हैं। उसके थूहे में नक्षत्रों सहित द्युलकों, पीठ में यमराज, अपानदेश में संपूर्ण पीठ एवं गोबर में स्वयं लक्ष्मी जी निवास करती हैं, नथुनों में अश्विनी कुमारों का एवं होठों में भगवती चण्डिका का वास है। गौओं के जो स्तन हैं, वे जल से पूर्ण चारों समुद्र हैं, उनके रंभाने में देवी सावित्री तथा हुंकार में प्रजापति का वास है। इतना ही नहीं समस्त गौएं साक्षात् विष्णुरूप हैं, उनके संपूर्ण अंगों में भगवान केशव श्रीकृष्ण विराजमान रहते हैं।

गौ के शरीर में समस्त देवगण निवास करते हैं और गौ के पैरों में समस्त तीर्थ निवास करते हैं। गौ के गुह्यभाग में लक्ष्मी सदा रहती है। गौ के पैरों में लगी हुई मिट्टी का तिलक जो मनुष्य अपने मस्तक में लगाता है, वह तत्काल तीर्थ जल में स्नान करने का पुण्य प्राप्त करता है और उसकी पद-पद पर विजय होती है। जहां पर गौएं रहती हैं उस स्थान को तीर्थभूमि कहा गया है, ऐसी भूमि में जिस मनुष्य के प्राण निकलते है वह तत्काल मुक्त हो जाता है। यह निश्चित है। गोमाता का दर्शन एवं उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा करनी चाहिए। ऐसा करने से सातों द्वीपों साहित भूमण्डल की प्रदक्षिणा हो जाती है। गौएं समस्त प्राणियों की माताएं एवं सारे सुख प्रदान करने वाली है। वृद्धि की आकांक्षा करने वाले मनुष्य को नित्य गौओं की प्रदक्षिणा करनी चाहिए। गोमाता की सेवा से, पंचगव्य (गोदूध, गोबर, गोमूत्र, घी, दही) के सेवन करने से तथा गौ का चरणोदक मार्जन करने से तीर्थ स्नान का फल प्राप्त होता है। गोसेवा बड़ी से बड़ी दुस्तर विपत्तियों से रक्षा करती है।

ज्योतिषशास्त्रनुसार ग्रहों की विपरीत अवस्था में गोसेवा ही प्रमुख उपाय बताया गया है। गोमाता की पुण्यमयी महिला का कीर्तन, श्रवण, दर्शन एवं उसका सत्पात्र को दान संपूर्ण पापों को दूर करता है। जो मानव घास- चारे आदि से गाय की नित्य पूजा सेवा करता है, देवता और पितर उसकी कामना पूर्ति करते रहते हैं।

गाय को तृण खिलाने तथा लवण खिलाने का बहुत ही पुण्य बताया गया हैः

कहा गया है कि तीर्थ स्थानों में जाने से, ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो पुण्य प्राप्त होता है तथा सभी व्रतों और उपवासों में एवं तपस्याओं में जो पुण्य स्थित है, महादान देने में जो पुण्य है, श्रीहरि की पूजा में जो पुण्य है, पृथ्वी की परिक्रमा में जो पुण्य है और मनुष्य को समस्त यज्ञों में यज्ञ दीक्षा ग्रहण कर जो पुण्य है, समस्त सत्यवाक्यों में शास्त्रीय वेद-वाक्यों से जो पुण्य अर्जित होता है-वे सभी पुण्य केवल गाय को घास, तृण, लवण आदि खिलाने भर से तत्क्षण ही मिल जाते हैं।

श्री राधामाधव धेनुशाला:

श्रीराधामाधव धेनुशाला में बहुत सी गायों का संरक्षण, पालन एवं सेवा का कार्य होता है। विभिन्न शुभ अवसरों पर गोमाता का पूजन होता है, गोपष्टमी का पावन पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है। गोभक्तों द्वारा समय-समय गोमाता के लिए हरा चारा, नमक, गुड़, आटा इत्यादि खाद्य पदार्थ का दान किया जाता है। गोभक्त यजमानों द्वारा विषेष अवसरों पर ‘गोदान’ विधि- विधान द्वारा किया जाता है। जो प्रत्यक्ष गोदान नहीं कर पाते है। वह गाय के मूल्य का ‘दान’ करके गोदान पुण्य का लाभ प्राप्त करते हैं। गोमाता के चारा आदि के लिए लोगों द्वारा धन का ‘दान’ किया जाता है।